Thursday, June 7, 2007

दुश्मन मां.....

मां
तुम जब फोन पर
भरे गले से पूछती हो
कैसे हो बेटा
हजारों किलोमीटर दूर मैं बैठा
बरबस बोल देता हूं
ठीक हूं, ठीक हूं...सहमा सहमा सा।

सुबह बात होती है
तो मां पूंछती है...नाश्ता किया
दोपहर में बात होती है तो...खाना खाया या नहीं
शाम को ......खाना कब खाते हो
पर मां को मैं नही बताता...
कि नाश्ता करने को टाइम नही मिलता
और आफिस की कैंटीन का खाना अच्छा नही लगता.

मुझे याद है, जब मैं पिछले साल
गांव गया था,
मां चार टाइम चाय के लिए पूछती थी
उसे लगता था बेटा शहर से आया है
शायद मां को इस बात का पता नही था कि
शहर में रहने वाले अब क्या क्या पीने लगे हैं।

फोन पर अक्सर मैं
मां से पूछता हूं
घर के क्या हाल हैं
अरे बेटा..... मां कुछ देर के लिए चुप हो जाती है
और जब बोलती है, तो सिर्फ पूछती है
अपनी बताओ कैसे हो
मुझे लगता है
वो घर का सारा कोहराम
छुपा जाती है मुझसे।

अरे अभी कल की तो बात है
मैं अपने पिता जी से बात कर रहा था
वो घर का सारा कोहराम मुझे बता रहे थे
मेरी जिम्मेवारियों को बता रहे थे
तभी पीछे से मां की आवाज आई
अरे वो तो इतना दूर हमसे बैठा है
उसे क्यों टेंशन दे रहे हो,
इस बात पर मां को
पिता जी से डांट भी मिली थी।

मां तो ऐसी ही होती है

लेकिन आज जब मेरे पास
एक स्टोरी आई
जिसमें मां ने अपने बेटे का कत्ल किया था
तो मैंने स्टोरी को नाम दिया...
दुश्मन मां......तो मुझे एहसास हुआ

मां ऐसी भी होती है।
...पुरक़ैफ़

3 comments:

अनिल रघुराज said...

संभल के...वक्त बदल रहा है। माता कुमाता भी होती है।

Raviratlami said...

"...मुझे याद है, जब मैं पिछले साल
गांव गया था,
मां चार टाइम चाय के लिए पूछती थी
उसे लगता था बेटा शहर से आया है
शायद मां को इस बात का पता नही था कि
शहर में रहने वाले अब क्या क्या पीने लगे हैं।..."


सही बयान है ;)

परंतु माता के कुमाता होने की संभावना करोड़ों में एकाध ही होती है - प्रकृति का कोई तत्व उलटा हो जाता होगा शायद...

रवीन्द्र रंजन said...

बहुत अच्छी कविता है।