दीमक लगी जड़ें, निराश पड़ी हैं पांव फैलाये, मौत के इंतजार में.......किसी की आस लगाये।
Friday, January 11, 2008
Wednesday, January 9, 2008
दिया और सूरज
Friday, January 4, 2008
नन्ही आम्रपाली
उसे मैंने देखा है....सड़क की फुटपाथ वाली रोड पर
रात के बारह बजे के बाद मंधिम रोशनी में खड़ी
पहली नजर में लगा कोई मासूम बच्ची भटक गई है घर का रास्ता
मदद के लिए ही तो मैंने रोकी थी अपनी गाड़ी
लेकिन मैं सन्न रह गया था जब वो मेरे पास आई और जुबान खोली
500 रूपये, एक घंटे का........सकते में आ गया था मैं
कुछ पल पहले मासूम सी दिखने वाली वो नन्ही आम्रपाली अब जवान लग रही थी
उसके नखरे भी जवान लग रहे थे
मेरी कुछ समझ में नही आ रहा था
बस मैंने अचानक गाड़ी आगे बढ़ा दी
और एक नन्ही सी आवाज सुनाई पड़ी
भड़ुओं को करना धरना कुछ नही चले आते हैं.....।
रात के बारह बजे के बाद मंधिम रोशनी में खड़ी
पहली नजर में लगा कोई मासूम बच्ची भटक गई है घर का रास्ता
मदद के लिए ही तो मैंने रोकी थी अपनी गाड़ी
लेकिन मैं सन्न रह गया था जब वो मेरे पास आई और जुबान खोली
500 रूपये, एक घंटे का........सकते में आ गया था मैं
कुछ पल पहले मासूम सी दिखने वाली वो नन्ही आम्रपाली अब जवान लग रही थी
उसके नखरे भी जवान लग रहे थे
मेरी कुछ समझ में नही आ रहा था
बस मैंने अचानक गाड़ी आगे बढ़ा दी
और एक नन्ही सी आवाज सुनाई पड़ी
भड़ुओं को करना धरना कुछ नही चले आते हैं.....।
Tuesday, October 30, 2007
एक पैर का नाच
शहर के बीच चौराहे की फुटपाथ पर जमा थी भीड़
चल रहा था एक पैर का नाच
लोग टकटकी लगाये देख रहे थे उस सोलह साल की लड़की को
जो फिल्मी धुन पर दिखा रही थी एक पैर का नाच
नाच का ये तमाशा दिखा रही लड़की बहुत सुन्दर थी
किसी गांव की गोरी की तरह
घुंघरुओं की छनक के साथ धड़क रहा था वहां पर खड़े कितने नौजवानों का दिल
जिनकी नजर पैरों पर कम....उसके गदराये जिस्म पर टिकी थी
एक पैर के इस नाच पर खूब वाहवाही भी मिल रही थी और तालियां भी बज रही थी
बीच बीच में आवाज भी आ रही थी.. जियो छम्मक छल्लो...
पूरे एक घंटे बाद नाच बंद हो गया
कितने लोगों के हाथ अपने अपने जेब में गये
जिनकी जेब से सिक्के निकले उन्होंने जमीन पर बिछे कपड़े पर उछाल दिए
जिनकी जेब से नोट निकली वो कुछ सोचने के बाद आगे बढ़ गये।
सब लोगों के जाने तक मैं वहां खड़ा रहा
मैंने उस लड़की से पूछा तुम्हारा पैर कैसे कट गया
उस लड़की की आंखे नम हो गई थी
उसने मेरी तरफ देखा
कुछ देर बाद बोली
एक ट्रेन एक्सीडेंट में मेरे मां बाप मर गये है और मेरा पैर कट गया था
वो रोने लगी थी....ढाढस के दो शब्द मैंने भी बोले थे
तीन दिन बाद मैंने शहर के दूसरे चौराहे पर भी एक पैर का नाच होते देखा था।
चल रहा था एक पैर का नाच
लोग टकटकी लगाये देख रहे थे उस सोलह साल की लड़की को
जो फिल्मी धुन पर दिखा रही थी एक पैर का नाच
नाच का ये तमाशा दिखा रही लड़की बहुत सुन्दर थी
किसी गांव की गोरी की तरह
घुंघरुओं की छनक के साथ धड़क रहा था वहां पर खड़े कितने नौजवानों का दिल
जिनकी नजर पैरों पर कम....उसके गदराये जिस्म पर टिकी थी
एक पैर के इस नाच पर खूब वाहवाही भी मिल रही थी और तालियां भी बज रही थी
बीच बीच में आवाज भी आ रही थी.. जियो छम्मक छल्लो...
पूरे एक घंटे बाद नाच बंद हो गया
कितने लोगों के हाथ अपने अपने जेब में गये
जिनकी जेब से सिक्के निकले उन्होंने जमीन पर बिछे कपड़े पर उछाल दिए
जिनकी जेब से नोट निकली वो कुछ सोचने के बाद आगे बढ़ गये।
सब लोगों के जाने तक मैं वहां खड़ा रहा
मैंने उस लड़की से पूछा तुम्हारा पैर कैसे कट गया
उस लड़की की आंखे नम हो गई थी
उसने मेरी तरफ देखा
कुछ देर बाद बोली
एक ट्रेन एक्सीडेंट में मेरे मां बाप मर गये है और मेरा पैर कट गया था
वो रोने लगी थी....ढाढस के दो शब्द मैंने भी बोले थे
तीन दिन बाद मैंने शहर के दूसरे चौराहे पर भी एक पैर का नाच होते देखा था।
Tuesday, October 2, 2007
मुर्दे की ख्वाहिश
शहर की भीड़ भाड़ वाली सड़क पर
जा रही थी ठेले पर एक लाश
साथ में चल रहा था सैकड़ों लोंगों का हुजूम
राम नाम सत्य है के लग रहे थे नारे
सफेद कपड़े में सजे धजे थे सारे लोग
फूलों से लदी लाश और ठेला
बढ़ता जा रहा था.
सड़क पर चलने वाला हर शख्स
जो भी जनाजे नुमा ठेले के पास से गुजरा
उसका सिर सजदे के लिए जरूर झुका
मैं भी उस ठेले के पास से गुजरा
मैंने भी सजदा किया
और अचानक एक सवाल मेरे जेहन में आया
कि इस जनाजे के साथ सैकड़ों लोंग चल रहे हैं
लेकिन चार ऐसे कंधे नही हैं जो मुर्दे को कब्र तक ले जा सके
क्योंकि मरने के बाद हर मुर्दे की यही ख्वाहिश होती है चार कंधों की।
जा रही थी ठेले पर एक लाश
साथ में चल रहा था सैकड़ों लोंगों का हुजूम
राम नाम सत्य है के लग रहे थे नारे
सफेद कपड़े में सजे धजे थे सारे लोग
फूलों से लदी लाश और ठेला
बढ़ता जा रहा था.
सड़क पर चलने वाला हर शख्स
जो भी जनाजे नुमा ठेले के पास से गुजरा
उसका सिर सजदे के लिए जरूर झुका
मैं भी उस ठेले के पास से गुजरा
मैंने भी सजदा किया
और अचानक एक सवाल मेरे जेहन में आया
कि इस जनाजे के साथ सैकड़ों लोंग चल रहे हैं
लेकिन चार ऐसे कंधे नही हैं जो मुर्दे को कब्र तक ले जा सके
क्योंकि मरने के बाद हर मुर्दे की यही ख्वाहिश होती है चार कंधों की।
Monday, September 17, 2007
बोल- बचन
हर सवाल का जवाब होता है, बोल-बचन के पास
और हर जवाब गलत होता है, बोल-बचन का
अगर आप यकीन कर ले उनकी बात पर,
तो आपकी नईंया कभी कभी भी पार नही हो सकती।
अभी कल की बात है
मैंने बोल-बचन से बताया था कि मेरे एक खास दोस्त की बीवी अस्पताल में भर्ती है
सीरियस है, उसे कल पांच बॉटल खून की जरुरत है, कुछ इंतजाम करो
बोल बचन ने तीन बॉटल खून दिलाने का वादा कर दिया था,
मैंने भी अपने दोस्त को बेफिक्र कर दिया था।
दूसरे दिन जब बोल बचन को फोन पे फोन किया तो शाम तक उनका फोन नही मिला
शाम को जब मिला तो मैंने खून वाली बात की, तो बोल बचन ने कहां अरे मैं तो भूल ही गया था
उन्होंने कहां मैं अभी कुछ इंतजाम कर रहा हूं.....
मैंने उन्हें बताया रहने दो पेंसेंट मर चुका है,खून न मिलने कि वजह से।
उस समय बोल बचन थोड़ा गंभीर हो गये थे।
हर ऑफिस में कई बोल बचन होते हैं
जिनके भरोसे पर ही ऑफिस में कभी कभी बवाल होता रहता है
बोल बचन के भरोसे कई लोग अपने बॉस को तमाम आश्वासन दे देते हैं
और बोल बचन अपने वसूल पर कायम रहते हैं
काम समय से नही होता और फिर डांट मिलना वाजिब है।
बोलो बोल- बचन की जय...........
और हर जवाब गलत होता है, बोल-बचन का
अगर आप यकीन कर ले उनकी बात पर,
तो आपकी नईंया कभी कभी भी पार नही हो सकती।
अभी कल की बात है
मैंने बोल-बचन से बताया था कि मेरे एक खास दोस्त की बीवी अस्पताल में भर्ती है
सीरियस है, उसे कल पांच बॉटल खून की जरुरत है, कुछ इंतजाम करो
बोल बचन ने तीन बॉटल खून दिलाने का वादा कर दिया था,
मैंने भी अपने दोस्त को बेफिक्र कर दिया था।
दूसरे दिन जब बोल बचन को फोन पे फोन किया तो शाम तक उनका फोन नही मिला
शाम को जब मिला तो मैंने खून वाली बात की, तो बोल बचन ने कहां अरे मैं तो भूल ही गया था
उन्होंने कहां मैं अभी कुछ इंतजाम कर रहा हूं.....
मैंने उन्हें बताया रहने दो पेंसेंट मर चुका है,खून न मिलने कि वजह से।
उस समय बोल बचन थोड़ा गंभीर हो गये थे।
हर ऑफिस में कई बोल बचन होते हैं
जिनके भरोसे पर ही ऑफिस में कभी कभी बवाल होता रहता है
बोल बचन के भरोसे कई लोग अपने बॉस को तमाम आश्वासन दे देते हैं
और बोल बचन अपने वसूल पर कायम रहते हैं
काम समय से नही होता और फिर डांट मिलना वाजिब है।
बोलो बोल- बचन की जय...........
Tuesday, September 11, 2007
कमबख्त मेरी जिंदगी
नींद कम नही होती, आदत से ज्यादा सोने के बाद भी।
सालों बीत गये, न तो सूरज उगते देखा और न ही डूबते हुए
अक्सर तस्वीरें देखता हूं, सन राइज...सन सेट।
मेरे घर के दरवाजें रातभर खुले रहते हैं
बिना किसी डर के मेरे इंतजार में।
जब घर के लोग सो जा जाते हैं तब मैं दबे पांव घर में घुसता हूं
जब घर के लोग अपने कामों पर चले जाते हैं तब मैं सुबह की चाय पीता हूं
जिंदगी का हर पल, कमबख्त हो गया है।
हर पल हमारी नजर दुनिया की तमाम खबरों पर होती है
एक भी खबर छूटने पर नौकरी तक जा सकती है
लेकिन मेरे पिता जी बीमार हैं ये बात मुझे चार दिन बाद पता चली
कमबख्त मैं, कमबख्त मेरी जिंदगी।
सालों बीत गये, न तो सूरज उगते देखा और न ही डूबते हुए
अक्सर तस्वीरें देखता हूं, सन राइज...सन सेट।
मेरे घर के दरवाजें रातभर खुले रहते हैं
बिना किसी डर के मेरे इंतजार में।
जब घर के लोग सो जा जाते हैं तब मैं दबे पांव घर में घुसता हूं
जब घर के लोग अपने कामों पर चले जाते हैं तब मैं सुबह की चाय पीता हूं
जिंदगी का हर पल, कमबख्त हो गया है।
हर पल हमारी नजर दुनिया की तमाम खबरों पर होती है
एक भी खबर छूटने पर नौकरी तक जा सकती है
लेकिन मेरे पिता जी बीमार हैं ये बात मुझे चार दिन बाद पता चली
कमबख्त मैं, कमबख्त मेरी जिंदगी।
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