Saturday, April 28, 2007

खुदा

रास्ते में आज पड़े थे भगवान
कुछ मैले थे कुचैले थे,
पैरों के उन पर दिख रहे थे निशान
हाय कैसे हैं ये लोग,
जो अपने घरों में टांगते हैं
भगवान की तस्वीर
करते हैं पूजा, जलाते हैं सुगंधित अगरबत्तियां
और जब करते हैं घर की सफाई
तो सड़क पर फेंके जाते हैं भगवान
फिर पैरों से कुचले जाते हैं भगवान।
... पुरकैफ

5 comments:

Shrish said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है राजेश जी। नियमित लेखन हेतु मेरी तरफ से शुभकामनाएं।

नए चिट्ठाकारों के स्वागत पृष्ठ पर अवश्य जाएं।

ई-पंडित

dhurvirodhi said...

स्वागत है राजेश जी;
आपका मंजर हमें सुहाना लग रहा है.

इसी तरह महकाते रहिये

Sanjeet Tripathi said...

"और जब करते हैं घर की सफाई
तो सड़क पर फेंके जाते हैं भगवान
फिर पैरों से कुचले जाते हैं भगवान।"

सत्य।
एक अच्छी रचना।
आप मानेंगे नहीं मैं अपने घर में सिर्फ़ इसिलिए देवी-देवताओं वाले कैलेंडर लगाने के सख्त खिलाफ़ हूं। साल भर तो हम उन कैलेंडर वाले भगवान की आराधना करें फ़िर या तो उन्हें तालाब में विसर्जित करें या फ़िर घर के एक कोनें में पड़ा रहनें दें ना जाने कब तक।
स्वागत है चिट्ठा जगत में आपका
शुभकामनाएं

परमजीत बाली said...
This comment has been removed by the author.
परमजीत बाली said...

राजेश जी,आप की कविता कुछ सोचने को मजबूर करती है।अच्छी कविता है। बधाई ।