जवाब की होड़ में एक दूसरे की बजाते रहो
एक दफ्तर है, अलग- अलग डेस्क हैं
एसाइनमेंट डेस्क,एडीटोरियल डेस्क,कापीराइटर डेस्क
सब की एक दूसरे से ठनी रहती हैं
कब किस पर कौन चढ़ बैठे
डायरेक्ट एक दूसरे का नाम लेकर कोई पंगा नही लेता
सब ने एक दूसरे का रोमांटिक नाम रख रखा है,
मुझे पता है लेकिन लिखूंगा नही, लोग नाराज हो जाते हैं।
कोने में बैठकर,फुरसत में सब एक दूसरे की
बजाते रहते हैं,बातों बातों में ही बजाते रहते हैं।
इस ऑफिस में इधर एक तब्दीली आई है
पहले इन लोगों की बॉस बजाते थे
अब ये आपस में एक दूसरे की बजाते रहते हैं।
एक प्रदेश है,
एक सरकार है,
सरकार चलाती हैं मायावती
मायावी मायावती,
जब जब उनकी सरकार आती है
वो भी अपने विपक्षियों की बजाती रहती है
शायद वो बजाने के लिए ही मुख्यमंत्री बनती हैं।
अब तो ब्लॉग पर बजाने वालों की कमी नही है
अब इनका परिवार ब्लॉग पर
बिना किसी परिवार नियोजन की व्यवस्था के बढ़ता जा रहा है।
सब एक दूसरे की बजाने पर तुले हैं
कुछ लोगों ने तो कुछ साहित्यकारों, कवियों, चिट्ठाकारों की
बजाने के लिए ही ब्लॉग बनाया है
और जब जब मौका मिला है, लोगों की बजाया है।
बजाते रहों.....RED FM 93.5
Monday, August 13, 2007
पेट में कब्रिस्तान
इस पापी पेट में जो भी जाता है, दफ्न हो जाता है
मुर्गे, बकरे और न जाने क्या क्या
झोपड़ों की उस बस्ती में जब आग लगी थी
जब सब कुछ जल गया था,
मासूम से चेहरे तब्दील हो गये थे मांस के लोथड़े में
कितनी गर्भवती महिलाओं के पेट में ही दफ्न हो गयी थी अजन्मी औलाद
तब भी कई पेट कब्रिस्तान बन गये थे।
कल ही मेरे मोहल्ले में एक नाबालिक लड़की ने आत्म हत्या की थी
कारण था वो बिन ब्याही मां बन गई थी,
बदनामी के डर से उसने भी पेट को कब्रिस्तान बना डाला
सियासत के चौराहे पर
जब जलाया गयी थी एक मसाल
जिसमें कसम खायी थी देश के दुश्मनों ने
कि वो किसी को चैन से जीने नही देगें
तब से आज तक होते रहे हैं बम के धमाके और
हवा में उड़ते रहे हैं पूरे के पूरे जिस्म टुकड़ो में तब्दील होकर
जिनका नाम और पता आज तक उनके घर वालों को नही मिला
क्योंकि सियासत के पहरेदारों के पेट में भी है एक कब्रिस्तान
जहां दफ्न हो जाते है खूनी सियासत के सारे सबूत।
मुर्गे, बकरे और न जाने क्या क्या
झोपड़ों की उस बस्ती में जब आग लगी थी
जब सब कुछ जल गया था,
मासूम से चेहरे तब्दील हो गये थे मांस के लोथड़े में
कितनी गर्भवती महिलाओं के पेट में ही दफ्न हो गयी थी अजन्मी औलाद
तब भी कई पेट कब्रिस्तान बन गये थे।
कल ही मेरे मोहल्ले में एक नाबालिक लड़की ने आत्म हत्या की थी
कारण था वो बिन ब्याही मां बन गई थी,
बदनामी के डर से उसने भी पेट को कब्रिस्तान बना डाला
सियासत के चौराहे पर
जब जलाया गयी थी एक मसाल
जिसमें कसम खायी थी देश के दुश्मनों ने
कि वो किसी को चैन से जीने नही देगें
तब से आज तक होते रहे हैं बम के धमाके और
हवा में उड़ते रहे हैं पूरे के पूरे जिस्म टुकड़ो में तब्दील होकर
जिनका नाम और पता आज तक उनके घर वालों को नही मिला
क्योंकि सियासत के पहरेदारों के पेट में भी है एक कब्रिस्तान
जहां दफ्न हो जाते है खूनी सियासत के सारे सबूत।
Friday, August 10, 2007
चैनल का चौराहा
दस बजते ही उस चौराहे पर
जमा होने लगती है भीड़
सुबह ऐसे स्ट्रगलर की
जो बनना चाहते हैं इलेक्ट्रानिक मीडिया के जर्नलिस्ट और
रात को दारु पीने के लिए ऐसे नौकरी पेशा लोगों की
जो इलेक्ट्रानिक मीडिया के जर्नलिस्ट बन चुके हैं
सुबह चाय की चुस्की और रात को किसी के नाम जाम
गजब है चैनल का चौराहा
दिन में भी गुलजार
रात में भी गुलजार
एक चाय और एक सिगरेट के कश से
इस चौराहे पर किसी भी सनसनीखेज खबर की
पंच लाइन, प्रोमो और स्टिंग बनते हैं जो
पूरे देश में सनसनी फैला देते हैं।
लेकिन ये चौराहा रहता है जस का तस
आज कल इस चौराहे पर चैनल के बॉस भी बैठकी लगाते है
कई चैनल के बॉस एक साथ, एक दूसरे का दुख बांटने
या फिर अपने नीचे काम करने वाले लोगों की खबर लेने के लिए
चाय वाला अक्सर बॉस लोगों को गाली देता होगा
क्योंकि उसका धंधा चौपट हो जाता है, ग्राहक कम हो जाते हैं।
सुना है चैनल के इस चौराहे पर
आज कल खुफिया विभाग की नजर है
क्योंकि वहां अब दलाल भी इकट्ठा होते हैं।
जमा होने लगती है भीड़
सुबह ऐसे स्ट्रगलर की
जो बनना चाहते हैं इलेक्ट्रानिक मीडिया के जर्नलिस्ट और
रात को दारु पीने के लिए ऐसे नौकरी पेशा लोगों की
जो इलेक्ट्रानिक मीडिया के जर्नलिस्ट बन चुके हैं
सुबह चाय की चुस्की और रात को किसी के नाम जाम
गजब है चैनल का चौराहा
दिन में भी गुलजार
रात में भी गुलजार
एक चाय और एक सिगरेट के कश से
इस चौराहे पर किसी भी सनसनीखेज खबर की
पंच लाइन, प्रोमो और स्टिंग बनते हैं जो
पूरे देश में सनसनी फैला देते हैं।
लेकिन ये चौराहा रहता है जस का तस
आज कल इस चौराहे पर चैनल के बॉस भी बैठकी लगाते है
कई चैनल के बॉस एक साथ, एक दूसरे का दुख बांटने
या फिर अपने नीचे काम करने वाले लोगों की खबर लेने के लिए
चाय वाला अक्सर बॉस लोगों को गाली देता होगा
क्योंकि उसका धंधा चौपट हो जाता है, ग्राहक कम हो जाते हैं।
सुना है चैनल के इस चौराहे पर
आज कल खुफिया विभाग की नजर है
क्योंकि वहां अब दलाल भी इकट्ठा होते हैं।
Monday, August 6, 2007
एक गोरिया थी...
मेरे गांव में एक गोरिया थी.....
नाम था उसका सावित्री....
चेहरे से गोरी गोरी थी....
इस लिए लोग उसे गोरिया कहने लगे थे..
लम्बी थी सुन्दर थी..
एक साल पहले ही वो नई नवेली दुल्हन बन कर आई थी
गांव में वो औरतों के बीच चर्चा का विषय थी...
एक गरीब घर में ब्याह कर आई थी।
धीरे धीरे वो गांव के लौडों की भी नजर में बस गई थी
जिस घर में वो ब्याह कर आई थी...
ठीक उसी घर के सामने पुराने जमाने के जमींदार कहे जाने वाले
लड़को का घर भी था।
अब उनके घर के जवान लड़को की नजर गोरिया पर थी
गोरिया का पति समझ रहा था कि उसकी बीबी
पर अब जमीदारों की नजर पड़ गई है
वो अपनी बीवी को घर से निकलने नही देता था
लेकिन एक कमरे के घर में छिपा भी नही पाता था
और एक दिन गोरिया के पति की लाश गांव के बाहर बने एक कुएं में मिली
गोरिया अब घर में अकेली थी....साथ में उसकी बूढ़ी सास भी थी न के बराबर
गोरिया अब गांव दारी से भी वास्ता रखने लगी थी
अब उसके सिर से घूंघट हट गया था.....पान भी खाने लगी थी
गांव के लौडो के साथ अब उसे गुटखा खाते
नौरंगी लाल की दुकान पर लोग देखने लगे थे
वो अक्सर गांव की औरतों के साथ चौरा करते देखी जाती
लेकिन घर के बाहर।
गोरिया को घर के अंदर लाने से सब डरती थी..शायद बदनामी
गोरिया के होठों पे लिपिस्टिक का रंग गहरा हो गया था
गांव की औरतें अब उसे छिनाल कहने लगी थी
गांव के लौडे रात का इंतजार करते थे
एक दिन गांव में कानाफूसी थी कि गोरिया कल फलाने के साथ पकड़ी गई
दूसरे दिन गोरिया की लाश पास के तालाब के पास पड़ी थी
रात में गांव के लोगों ने गोली की आवाज....और
गोरियां की चीख भी सुनी थी।
नाम था उसका सावित्री....
चेहरे से गोरी गोरी थी....
इस लिए लोग उसे गोरिया कहने लगे थे..
लम्बी थी सुन्दर थी..
एक साल पहले ही वो नई नवेली दुल्हन बन कर आई थी
गांव में वो औरतों के बीच चर्चा का विषय थी...
एक गरीब घर में ब्याह कर आई थी।
धीरे धीरे वो गांव के लौडों की भी नजर में बस गई थी
जिस घर में वो ब्याह कर आई थी...
ठीक उसी घर के सामने पुराने जमाने के जमींदार कहे जाने वाले
लड़को का घर भी था।
अब उनके घर के जवान लड़को की नजर गोरिया पर थी
गोरिया का पति समझ रहा था कि उसकी बीबी
पर अब जमीदारों की नजर पड़ गई है
वो अपनी बीवी को घर से निकलने नही देता था
लेकिन एक कमरे के घर में छिपा भी नही पाता था
और एक दिन गोरिया के पति की लाश गांव के बाहर बने एक कुएं में मिली
गोरिया अब घर में अकेली थी....साथ में उसकी बूढ़ी सास भी थी न के बराबर
गोरिया अब गांव दारी से भी वास्ता रखने लगी थी
अब उसके सिर से घूंघट हट गया था.....पान भी खाने लगी थी
गांव के लौडो के साथ अब उसे गुटखा खाते
नौरंगी लाल की दुकान पर लोग देखने लगे थे
वो अक्सर गांव की औरतों के साथ चौरा करते देखी जाती
लेकिन घर के बाहर।
गोरिया को घर के अंदर लाने से सब डरती थी..शायद बदनामी
गोरिया के होठों पे लिपिस्टिक का रंग गहरा हो गया था
गांव की औरतें अब उसे छिनाल कहने लगी थी
गांव के लौडे रात का इंतजार करते थे
एक दिन गांव में कानाफूसी थी कि गोरिया कल फलाने के साथ पकड़ी गई
दूसरे दिन गोरिया की लाश पास के तालाब के पास पड़ी थी
रात में गांव के लोगों ने गोली की आवाज....और
गोरियां की चीख भी सुनी थी।
Friday, August 3, 2007
रिपोर्टर का डर.......
वो रिपोर्टर है, एक न्यूज चैनल में
लेकिन डरती है...
उसे डर लग रहा है,
ऐसे बॉस से जिसके बारे में तमाम तरह की बातें
मीडिया के परिवार में फैलती रहती हैं..
सब कहते हैं वो तो बहुत बड़ा चमड़ी बाज है
वो रिपोर्टर ऐसे ठिकाने की तलाश में है
जहां का माहौल थोड़ा ठीक हो...
लेकिन उसे ये बात नामुमकिन लगती है..
शायद वो कुछ दिनों बाद इस खबरों की दुनिया को छोड़ दे
या फिर इस दुनिया दारी से समझौता कर ले....
लेकिन डरती है...
उसे डर लग रहा है,
ऐसे बॉस से जिसके बारे में तमाम तरह की बातें
मीडिया के परिवार में फैलती रहती हैं..
सब कहते हैं वो तो बहुत बड़ा चमड़ी बाज है
वो रिपोर्टर ऐसे ठिकाने की तलाश में है
जहां का माहौल थोड़ा ठीक हो...
लेकिन उसे ये बात नामुमकिन लगती है..
शायद वो कुछ दिनों बाद इस खबरों की दुनिया को छोड़ दे
या फिर इस दुनिया दारी से समझौता कर ले....
Thursday, August 2, 2007
जस का तस......
सात साल बाद जब मै अपने कालेज के हॉस्टल गया तो
सब कुछ जस का तस था........सिर्फ चेहरे नये थे
दरवाजे पर टूटे शीशे से आने वाली रोशनी को रोकने के लिए
अजंता की पेटिंग जो मैंने लगाई थी.
वो अभी भी लगी थी, सिर्फ वो धुधली हो गई थी
लेकिन रोशनी अभी भी वहां से नही आ रही थी
लगता है इसी लिए उसे हटाया नही गया...
कालेज की दीवारों पर जो नाम लिखे थे और जो स्केच मैंने बनाये थे
वो भी मैंने देखा, वो भी जस के तस थे
हां उसके बगल में कुछ नाम और लिख दिए गये थे
किसी की याद में
पढ़ कर,मेरी भी कुछ यादें ताजा हो गई थी..
लेकिन सब कुछ जस का तस था।
चौराहे की चाय की दुकान पर
वो लोग जो दिन भर बैठकी लगाते थे
वो सब वही पर मुझे दिखे,
हां उन पुराने चेहरे में कुछ नये चेहरे भी थे
कुछ बदला था तो चाय की दुकान की बनावट
जिसमें बरसाती पन्नी की जगह टिन थी
लेकिन बाकी सबकुछ जस का तस था।
मुझे एहसास हो रहा था...मैं सोच रहा था....
शायद दुनिया ठहर गयी है।
सब कुछ जस का तस था........सिर्फ चेहरे नये थे
दरवाजे पर टूटे शीशे से आने वाली रोशनी को रोकने के लिए
अजंता की पेटिंग जो मैंने लगाई थी.
वो अभी भी लगी थी, सिर्फ वो धुधली हो गई थी
लेकिन रोशनी अभी भी वहां से नही आ रही थी
लगता है इसी लिए उसे हटाया नही गया...
कालेज की दीवारों पर जो नाम लिखे थे और जो स्केच मैंने बनाये थे
वो भी मैंने देखा, वो भी जस के तस थे
हां उसके बगल में कुछ नाम और लिख दिए गये थे
किसी की याद में
पढ़ कर,मेरी भी कुछ यादें ताजा हो गई थी..
लेकिन सब कुछ जस का तस था।
चौराहे की चाय की दुकान पर
वो लोग जो दिन भर बैठकी लगाते थे
वो सब वही पर मुझे दिखे,
हां उन पुराने चेहरे में कुछ नये चेहरे भी थे
कुछ बदला था तो चाय की दुकान की बनावट
जिसमें बरसाती पन्नी की जगह टिन थी
लेकिन बाकी सबकुछ जस का तस था।
मुझे एहसास हो रहा था...मैं सोच रहा था....
शायद दुनिया ठहर गयी है।
Monday, July 30, 2007
इंटर्न.......
उसने जर्नलिस्ट बनने की पढ़ाई की थी....
एक तेज तर्रार जर्नलिस्ट.............
साल भर सिर खपाने के बाद
पत्रकारों के दायित्व की ढेर सारी बातें जेहन में पाल कर
वो एक न्यूज चैनल में इंटर्नशिप करने आई थी
देखने में भी वो सुन्दर थी.......एंकर माफिक
पहला दिन था, खबरों के घर में
कई नजरें कनखियों से तो कई नजरें उसको ताक रही थी
कुछ घूर भी रही थी.....
लेकिन वो सोच रही थी, इन लोगो ने तो मुझे पहले देखा भी नही..
तो फिर इतने ध्यान से मुझे क्यों देख रहे हैं
कुछ लोग उसके बारे में बात भी कर रहे थे
उसने सुना था, कोई कह रहा था लखनऊ से आई है....नवाबों के शहर से
वो कहने का मतलब समझ रही थी....
थोड़ा वो सकुचा गई थी....
एक हफ्ते बीत चुके तो
अब वो असल की खबर और खबरिया लोगो से थोड़ा मिल जुल गई थी...
लोग पास के चौराहे पर उसे चाय भी पिलाने ले जाने लगे
पद्रह दिन बाद......ऑफिस में उसी की चर्चा थी
जो भी उसके साथ चाय पी कर आता था
चार लोगो से बताता था
अब वो देर रात तक ऑफिस में रुकने लगी थी
इंटर्नशिप खत्म होने के दो चार दिन पहले मैंने देखा था
वो एक मोस्ट सीनियर, बॉस टाइप आदमी के साथ सुट्टा मार रही थी....
शायद उसकी............???
एक तेज तर्रार जर्नलिस्ट.............
साल भर सिर खपाने के बाद
पत्रकारों के दायित्व की ढेर सारी बातें जेहन में पाल कर
वो एक न्यूज चैनल में इंटर्नशिप करने आई थी
देखने में भी वो सुन्दर थी.......एंकर माफिक
पहला दिन था, खबरों के घर में
कई नजरें कनखियों से तो कई नजरें उसको ताक रही थी
कुछ घूर भी रही थी.....
लेकिन वो सोच रही थी, इन लोगो ने तो मुझे पहले देखा भी नही..
तो फिर इतने ध्यान से मुझे क्यों देख रहे हैं
कुछ लोग उसके बारे में बात भी कर रहे थे
उसने सुना था, कोई कह रहा था लखनऊ से आई है....नवाबों के शहर से
वो कहने का मतलब समझ रही थी....
थोड़ा वो सकुचा गई थी....
एक हफ्ते बीत चुके तो
अब वो असल की खबर और खबरिया लोगो से थोड़ा मिल जुल गई थी...
लोग पास के चौराहे पर उसे चाय भी पिलाने ले जाने लगे
पद्रह दिन बाद......ऑफिस में उसी की चर्चा थी
जो भी उसके साथ चाय पी कर आता था
चार लोगो से बताता था
अब वो देर रात तक ऑफिस में रुकने लगी थी
इंटर्नशिप खत्म होने के दो चार दिन पहले मैंने देखा था
वो एक मोस्ट सीनियर, बॉस टाइप आदमी के साथ सुट्टा मार रही थी....
शायद उसकी............???
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