दस बजते ही उस चौराहे पर
जमा होने लगती है भीड़
सुबह ऐसे स्ट्रगलर की
जो बनना चाहते हैं इलेक्ट्रानिक मीडिया के जर्नलिस्ट और
रात को दारु पीने के लिए ऐसे नौकरी पेशा लोगों की
जो इलेक्ट्रानिक मीडिया के जर्नलिस्ट बन चुके हैं
सुबह चाय की चुस्की और रात को किसी के नाम जाम
गजब है चैनल का चौराहा
दिन में भी गुलजार
रात में भी गुलजार
एक चाय और एक सिगरेट के कश से
इस चौराहे पर किसी भी सनसनीखेज खबर की
पंच लाइन, प्रोमो और स्टिंग बनते हैं जो
पूरे देश में सनसनी फैला देते हैं।
लेकिन ये चौराहा रहता है जस का तस
आज कल इस चौराहे पर चैनल के बॉस भी बैठकी लगाते है
कई चैनल के बॉस एक साथ, एक दूसरे का दुख बांटने
या फिर अपने नीचे काम करने वाले लोगों की खबर लेने के लिए
चाय वाला अक्सर बॉस लोगों को गाली देता होगा
क्योंकि उसका धंधा चौपट हो जाता है, ग्राहक कम हो जाते हैं।
सुना है चैनल के इस चौराहे पर
आज कल खुफिया विभाग की नजर है
क्योंकि वहां अब दलाल भी इकट्ठा होते हैं।
Friday, August 10, 2007
चैनल का चौराहा
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1 comments:
वाह..क्या बात है साब...यथार्थ की झलक दिख रही है..कई ऐसे चौराहो से वास्ता तो पडा है..जेहन मे है कुछ..फर्क सिर्फ इतना है कि वह चैनल के नही...
बढिया कविता..
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